“वे दिन गए जब बच्चे अपने बचपन का आनंद लेते थे।” मद्रास हाई कोर्ट (Madras High Court) ने मंगलवार तीन जनवरी को एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी करते हुए कहा कि अब उन्हें (बच्चों को) अपने छोटे-छोटे अहम के कारण अपने पिता और मां के बीच की लड़ाई देखने के लिए मजबूर किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि यह देखना दर्दनाक है कि इनमें से ज्यादातर झगड़ों में बच्चों को मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
जस्टिस पी.एन. प्रकाश और एन. आनंद वेंकटेश ने 13 साल तक अमेरिका में पैदा हुए और पले-बढ़े दो बच्चों के मामले से निपटने के दौरान अपनी पीड़ा व्यक्त की, जिन्हें उनकी मां अपने पति के साथ विवाद के बाद भारत ले आई और यह ऑनलाइन क्लासेस में भाग लेने के लिए मजबूर किया।
क्या है पूरा मामला?
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, कपल ने अप्रैल 1999 में शादी की थी और अपनी शादी के 10 दिनों के भीतर ही वे वर्जीनिया के लिए रवाना हो गए। कपल ने बाद में अमेरिकी नागरिकता हासिल कर ली। अप्रैल 2008 में पैदा हुए उनके जुड़वां बच्चे भी जन्म से ही अमेरिकी नागरिक बन गए। बच्चे साइंस ओलंपियाड में गोल्ड मेडलिस्ट थे और उनमें से एक ने तैराकी में जूनियर ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया।
दिसंबर 2020 तक सभी चीजें ठीक चल रही थीं, लेकिन इसके बाद कपल के बीच तब विवाद शुरू हो गया जब बच्चों की मां उन्हें लेकर भारत चली आई और अपने पति के साथ एक अलग रिश्ते के कारण लौटने से इनकार कर दिया। इसके बाद उसने फेयरफॉक्स काउंटी के सर्किट कोर्ट के समक्ष मामला दायर किया और तलाक की कार्यवाही के लंबित रहने तक बच्चों की कस्टडी अपने पास लेने का आदेश प्राप्त कर लिया।
हालांकि, जब अदालत के आदेशों के बावजूद बच्चों को उसे नहीं सौंपा गया, तो उसने मद्रास हाई कोर्ट के समक्ष वर्तमान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिसमें ग्रेटर चेन्नई के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया गया कि वह अपने नाबालिग बेटों को उनकी मां की कस्टडी से सुरक्षित करे और उसके पैरेंट्स एवं उन्हें उसे सौंप दें।
हाई कोर्ट का आदेश
जुड़वा बच्चों के साथ बातचीत के बाद जजों ने पाया कि बच्चे पूरी तरह से अपनी मां के नियंत्रण में थे और वे अमेरिका में मिलने वाली सभी सुख-सुविधाओं को छोड़ने और ऑनलाइन क्लासेस में भाग लेने के लिए तैयार थे। कोर्ट ने कहा कि “इस प्रकृति के मामलों में अदालत बच्चों के कहने के आधार पर फैसला नहीं करती है क्योंकि वे अपने जीवन में भारी उथल-पुथल के बीच हैं। बच्चों के सर्वोत्तम हित के आधार पर निर्णय लेने के लिए इस अदालत पर एक कर्तव्य डाला जाता है।”
जजों ने बताया कि भारत और अमेरिका के बीच समय के अंतर के कारण बच्चों को आधी रात के दौरान ऑनलाइन क्लासेस में भाग लेना पड़ता था, और वे सप्ताह में केवल चार दिन ही टीचरों के साथ बातचीत कर पाते थे। इसके अलावा, अन्य सभी पाठ्येतर गतिविधियां जिनमें वे अमेरिका में भाग ले रहे थे, एक गंभीर पड़ाव पर आ गए थे।
डिवीजन बेंच ने आगे कहा, “बच्चे अब एक ऐसे वातावरण में रह रहे हैं, जो उनके लिए पराया है, क्योंकि उनके जीवन का सबसे अच्छा हिस्सा, लगभग 13 वर्षों तक, केवल अमेरिका में बिताया गया था। हमारे विचार में बच्चों का सर्वोत्तम हित केवल सुनिश्चित किया जा सकता है अगर वे अपने मूल देश यानी अमेरिका लौट जाते हैं।”
कोर्ट ने महिला को दिया अमेरिका जाने का आदेश
कोर्ट ने कहा कि बच्चों (जो जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं) को अमेरिका के सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य परिवेश में लाया गया था और वे अपने मूल देश की जीवन शैली, भाषा, रीति-रिवाजों, नियमों और विनियमों के आदी हैं और वे उनके लौटने पर ही उनके बेहतर रास्ते और संभावनाएं होंगी। बच्चों ने भारत में जड़ें नहीं जमाई हैं। इसलिए, अगर वे अमेरिका लौटते हैं तो उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। जजों ने बच्चों की मां को निर्देश दिया कि वे उन्हें अमेरिका ले जाएं। आठ सप्ताह के भीतर उन्हें उनके पिता को सौंप दें और उस देश की अदालतों के समक्ष उनके कानूनी उपायों पर काम करें।
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