मुंबई के एक सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल (Senior Citizens Tribunal) के एक आदेश को बरकरार रखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने एक व्यक्ति और उसके परिवार को फ्लैट खाली करने का आदेश दिया है जिसमें उसके पिता वर्ली में स्थित एक SRA नाम के बिल्डिंग में रहते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) के मुताबिक, जस्टिस गौतम पटेल और नीला गोखले ने 13 अप्रैल को अपने फैसले में कहा, “याचिकाकर्ताओं को आज से 20 दिनों की अवधि के भीतर फ्लैट खाली करना होगा।”
क्या है पूरा मामला?
TOI के मुताबिक, हाई कोर्ट ने बहू, दो किशोर पोते और बेटे की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें ट्रिब्यूनल के माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के रखरखाव और कल्याण अधिनियम के तहत अगस्त 2021 के आदेश को चुनौती दी गई थी। ट्रिब्यूनल में पिता द्वारा की गई शिकायत में कहा गया था कि बेटे की शादी मई 2004 में हुई थी। शादी के बाद कपल कहीं और रहता था। जबकि मां के स्वामित्व वाले फ्लैट में माता-पिता और अन्य भाई-बहन रहते थे।
मई 2010 में पिता ने बेटे को मुंब्रा में एक फ्लैट और उसके हिस्से में आए 1.5 लाख रुपये दिए। रीडिवेलपमेंट के बाद मां को रिहैब फ्लैट अलॉट किया गया। जून 2019 में मां की मौत हो गई। इसके बाद बेटा और उसका परिवार पिता के फ्लैट में जबरन घुस गए और वहीं रहने लगे। बेटे ने 72 वर्षीय पिता और उसके साथ रहने वाली दो अविवाहित बेटियों को परेशान किया और धमकी दी। लेकिन बेटे ने दावा किया कि वह अपनी दिवंगत मां का सह-वारिस है और उसके फ्लैट में बराबर का हिस्सा है।
हाई कोर्ट का आदेश
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि ट्रिब्यूनल ने प्रतिद्वंद्वी दावों पर सावधानीपूर्वक विचार किया। जबकि याचिकाकर्ताओं के वकील आदित्य चितले और प्रथमेश भोसले ने तर्क दिया कि बहू और पोते के खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं। पीठ ने कहा कि वे बेटे के “परिवार के सदस्य” हैं। इसके अलावा, कि बहू “किसी भी तरह से एक निर्दोष तमाशबीन नहीं है और न ही वह सक्रिय रूप से अपने ससुर की रक्षा कर रही है”। उसने एक लंबी पुलिस शिकायत की थी। जजों ने कहा, “शिकायत पर एक सरसरी नजर डालने से पता चलता है कि पूरा संघर्ष संपत्ति, अर्थात् पुनर्वसन फ्लैट के बारे में है।”
जजों ने ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष पर गौर किया कि फ्लैट मां को आवंटित किया गया था। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा था कि दोनों पक्षों को किसी सौहार्दपूर्ण समाधान पर पहुंचना चाहिए, लेकिन इस बीच, पिता की याचिका को स्वीकार कर लिया और बेटे को 60 दिनों के भीतर फ्लैट खाली करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा, “आक्षेपित आदेश, हमारे विचार में अप्रतिबंधित है। यह जो आदेश देता है या करना चाहता है, उसमें यह असंगत नहीं है। यह प्रतिस्पर्धी इक्विटी को सही ढंग से संतुलित करता है।”
कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि यह एक साझा घर था, क्योंकि अदालत में सुनवाई के दौरान ऐसा कोई भी सबूत पेश नहीं किया गया था कि याचिकाकर्ता वहां (पिता के फ्लैट में) पहले से रहते थे। अदालत ने कहा कि याचिका में “कोई योग्यता नहीं” है। पीठ ने कहा, “आदेश (बेट और उसकी पत्नी द्वारा 20 दिनों के अंदर पिता का फ्लैट खाली करने का आदेश) को बिना किसी देरी के लागू किया जाना है।”
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