इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनावाई के दौरान अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि पार्टियों की आर्थिक परिस्थितियों को तौल कर बच्चों की कस्टडी का निर्धारण नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी पिता को सौंप दी।
क्या है पूरा मामला?
कपल ने 2008 में शादी की थी और बाद में दोनों अमेरिका चले गए। कोर्ट ने न्यू जर्सी के सुपीरियर कोर्ट में आपसी सहमति से तलाक प्राप्त किया था। जस्टिस शमीम अहमद कि पीठ ने पत्नी इरा शर्मा द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उनके दो नाबालिग बच्चों को उनके पूर्व पति धीरेंद्र पांडे से कस्टडी में लेने की मांग की गई थी। फिलहाल, पिता भारत में रहता है और उसकी पूर्व पत्नी अमेरिका में रहती है।
हाई कोर्ट
दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्कों और सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बच्चे अवैध कस्टडी में नहीं हैं। अदालत ने इरा शर्मा को कानून के अनुसार कस्टडी के लिए उचित कानूनी उपाय करने का निर्देश दिया। जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि अदालत के लिए मुख्य विचार यह पता लगाना होगा कि क्या बच्चों की कस्टडी को गैरकानूनी और अवैध कहा जा सकता है और क्या बच्चों के कल्याण के लिए वर्तमान कस्टडी को बदलने की आवश्यकता है और बच्चों को जिसकी कस्टडी में वर्तमान में बच्चे हैं। उसके अलावा किसी अन्य की देखभाल और कस्टडी में सौंप दिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चों को माता-पिता दोनों के प्यार और स्नेह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि अभाव के परिणामस्वरूप बच्चे के प्रारंभिक वर्षों में प्रभावशाली और निर्दोष स्वभाव पर गंभीर फाइकोलॉजिकल प्रभाव पड़ता है। न्यायालय के अनुसार जब भी नाबालिग बच्चों की कस्टडी से संबंधित कोई सवाल अदालत के समक्ष उठता है, तो इस मामले का फैसला पार्टियों के कानूनी अधिकारों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, अदालत ने कहा कि बच्चों की कस्टडी प्रतिवादी पक्षों की आर्थिक परिस्थितियों को तौल कर निर्धारित नहीं किया जा सकता है। मामला केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और भौतिक लाभों के आधार पर निर्धारित नहीं किया जाएगा जो एक दावेदार या दूसरे के घर में उपलब्ध हो सकते हैं। कोर्ट ने आगे कहा है कि बच्चे के कल्याण का निर्णय बच्चे के सामान्य मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक कल्याण सहित विचार के आधार पर किया जाना चाहिए।
तलाक की डिक्री पर विचार करने के बाद, अदालत ने कहा कि पिता पत्नी के खिलाफ एडल्ट्री और असहनीय मतभेदों के आरोपों को साबित करने में सक्षम रहा है। इस प्रकार, न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार की स्थिति का नाबालिग बच्चों के मनोवैज्ञानिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और यह बच्चों के कल्याण में भी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मां ने एक ईमेल के जरिए खुद भारत के किसी प्रतिष्ठित स्कूल में बच्चों का दाखिला कराने की सहमति दी थी और जब भी वह भारत में होगी, वह अपने बच्चों से उनके पिता के घर मिलने जाएगी।
अदालत ने आगे कहा कि यह भी विवाद का विषय नहीं है कि दोनों बच्चों का एडमिशन स्कूल में माता की सहमति से हुआ था, इस कारण से उसने स्वयं अपना आधार कार्ड और पासपोर्ट की प्रति प्रदान की है। इस प्रकार, न्यायालय ने कहा कि नाबालिग बच्चे पिता की अवैध कस्टडी में नहीं हैं और मां की सहमति से भारत में पढ़ रहे हैं। इसके अलावा, कोर्ट ने मां को सलाह दी कि वह कस्टडी पाने के लिए सही फोरम का रुख करें।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:-
– दोनों बच्चों की कस्टडी पिता के पास रहेगी।
– चूंकि मां अमेरिका में रहती है, लेकिन उसे भारत में रहने के दौरान शाम को 6:00 बजे से 8:00 बजे के बीच पिता के वर्तमान निवास पर बच्चों से मिलने की अनुमति है। यदि वह विदेश में है, तो उसे रात 8.00 बजे से 8.30 बजे के दौरान अपने बच्चों के साथ मोबाइल फोन, व्हाट्सएप कॉल या वीडियो कॉल पर बातचीत करने की अनुमति है।
– अगर मां प्यार और स्नेह के कारण कोई उपहार देना चाहती है या बच्चों की भलाई के लिए कुछ भी करना चाहती है, तो पिता या उसके परिवार के किसी सदस्य को कोई आपत्ति नहीं होगी। हालांकि, मां को इस बात का ध्यान रखना होगा कि ऐसी चीजें दी जाएंगी, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उपयोग और सुरक्षित हों।
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