छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान माना कि किसी भी मेडिकल साक्ष्य या रिकॉर्ड पर किसी अन्य सामग्री के अभाव में पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 377 के तहत कार्यवाही और कुछ नहीं बल्कि प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
क्या है पूरा मामला?
Lawbeat.in के मुताबिक, जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दर्ज धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) सहित IPC की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करने और बाद में चार्जशीट जमा करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
याचिकाकर्ता का तर्क
अदालत के समक्ष अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस तरह के अपराध का कोई गवाह नहीं हो सकता है, क्योंकि इसमें पति और पत्नी के बीच संबंध शामिल हैं और अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप के समर्थन में कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई है। इसलिए, धारा 161 (पुलिस द्वारा गवाहों की परीक्षा) या धारा 164 (केवल मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकारोक्ति की रिकॉर्डिंग) और धारा 164-A दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) याचिकाकर्ताओं को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकी।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि CrPC की धारा 164-A के अनुसार, बलात्कार पीड़िता की मेडिकल जांच आवश्यक है, लेकिन आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध के मामले में CrPC में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए धारा 377 के तहत प्रथम दृष्टया अपराध स्थापित करने के लिए शिकायत या अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर कुछ प्रथम दृष्टया सबूत लाए जाने चाहिए थे।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 375 के अनुसार, यदि एक पुरुष ने अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाए हैं और अगर पत्नी की उम्र 18 वर्ष से अधिक है तो यह आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार के दायरे में नहीं आएगा। इसलिए यदि पत्नी के साथ संभोग बलात्कार की कैटेगरी में नहीं आता है तो धारा 377 में वर्णित पति द्वारा किया गया कोई भी कृत्य भी अप्राकृतिक अपराध के दायरे में नहीं आएगा।
उन्होंने तर्क दिया कि वैवाहिक जीवन के समुचित कार्य के लिए संभोग के लिए किसी सहमति की आवश्यकता नहीं है। इसलिए धारा 375 (2) धारा 377 के तहत अपराध के आरोपों में याचिकाकर्ताओं के बचाव में आएगी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी प्रस्तुत किया था कि पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए सहमति लेने के लिए कानून की कोई आवश्यकता नहीं है।
पुलिस का तर्क
इसके विपरीत, राज्य की ओर से महाधिवक्ता (AG) ने CrPC की धारा 154 का उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़ित द्वारा की गई शिकायत के आधार पर FIR दर्ज करना पुलिस के लिए अनिवार्य है। केरल राज्य बनाम कुरीसुम मुट्टिल एंटनी (2007) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए एजी ने कहा कि FIR दर्ज करने के लिए मेडिकल टेस्ट आवश्यक नहीं है। साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता के बयान के आधार पर FIR में अपराध बनाया गया था, जिसे हाई कोर्ट द्वारा तत्काल रद्द नहीं किया जा सकता है।
हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता-पति द्वारा कथित अपराध किए जाने को दर्शाने वाली कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं थी। इसलिए, धारा 377 आईपीसी के रूप में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना और कुछ नहीं बल्कि प्रक्रिया का दुरुपयोग था। तदनुसार, न्यायालय ने कहा कि अन्य कथित अपराधों के लिए मुकदमा जारी रह सकता है, लेकिन पति के खिलाफ धारा 377 के तहत अपराध करने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाना चाहिए।
आखिरी में दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने कहा कि जहां तक आईपीसी की धारा 377 का संबंध है, आरोप के समर्थन में रिकॉर्ड पर किसी सामग्री के अभाव में, FIR दर्ज करना और कुछ नहीं, बल्कि प्रक्रिया का दुरुपयोग है। .
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