मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने 27 फरवरी, 2023 के अपने एक आदेश में फैमिली कोर्ट (Family Court) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को तलाक की याचिका के लंबित रहने के दौरान पति को अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट के मुताबिक, फैमिली कोर्ट के जज ने छोटी-सी प्रक्रिया को “बढ़ा” दिया और सहानुभूति खो दी।
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 2017 में पत्नी ने इस आधार पर विवाह को रद्द करने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया कि प्रतिवादी-पति और दूसरी महिला के बीच पहले की शादी अभी भी जारी है। इसके बाद पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए अर्जी दी। इन दोनों अर्जियों के लंबित रहने के दौरान पति ने अपनी पत्नी से भरण-पोषण के लिए एक और अर्जी दाखिल की।
पति का तर्क
पति ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि उसे उस घर से बाहर निकाल दिया गया है, जिसमें वह रह रहा था और वह अपने स्वास्थ्य की स्थिति के कारण व्यवसाय करने में असमर्थ है, जिसे वह चला रहा था। पति ने अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में भी डिटेल्स जारी दी, जहां उन्हें दिल की बीमारी थी। साथ ही वह एंजियोप्लास्टी से पीड़िता था।
पत्नी का तर्क
इस याचिका का पत्नी ने यह कहते हुए विरोध किया कि विवाह के समय पति के पास स्थायी नौकरी नहीं थी। इसके लिए उसने गहने गिरवी रख दिए थे और व्यवसाय शुरू किया, जो घाटे की वजह से बंद हो गया। तत्पश्चात इंडियन बैंक से लोन प्राप्त कर एक मकान खरीदा और पत्नी अचल संपत्ति का व्यवसाय कर परिवार चला रही है जबकि पति आदतन शराब पीकर मारपीट करता है। महिला ने यह भी दावा किया कि पति फाइनेंस और रियल एस्टेट का कारोबार कर रहा है और लाखों रुपये कमा रहा है और बहुत ही शानदार जीवन जी रहा है।
फैमिली कोर्ट
2018 में फैमिली कोर्ट के जज ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि पति की एंजियोप्लास्टी हुई है और उसका स्टेंट ठीक हो गया है। इस प्रकार पत्नी को अपने अलग रह रहे पति को अंतरिम रखरखाव के रूप में प्रति माह 20,000 रुपये देने का आदेश दिया। इस आदेश से व्यथित होकर पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की।
हाई कोर्ट
जस्टिस आर सुब्रमण्यम और जस्टिस के गोविंदराजन थिलाकावडी ने कहा कि फैमिली कोर्ट के जज ने छोटी-सी प्रक्रिया को “बढ़ा” दिया और सहानुभूति खो दी। फैमिली जज ने कहा कि पति की एंजियोप्लास्टी हुई है और स्टेंट लगा है, जिससे वह काम करने में असमर्थ हो गया। अपीलकर्ताओं ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि जब पति यह साबित करने में विफल रहा कि वह अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ है तो अदालत को अंतरिम भरण-पोषण का निर्देश नहीं देना चाहिए था। इसके अलावा, पति द्वारा दावा किया गया एकमात्र कारण यह है कि उसकी एंजियोप्लास्टी हुई है।
आगे यह तर्क दिया गया कि एंजियोप्लास्टी बड़ी हृदय शल्य चिकित्सा नहीं है, जो व्यक्ति को अपंग कर दे और पति अभी भी व्यवसाय कर सकता है। साथ ही अपनी आजीविका के लिए काम कर सकता है। चूंकि मामला भरण-पोषण के भुगतान से जुड़ा है, इसलिए अदालत ने पत्नी द्वारा पेश किए गए पिछले वर्षों के पति के आयकर रिटर्न के आकलन पर गौर करना भी उचित समझा।
अदालत ने कहा कि पति की पिछले वर्षों की औसत आय छह लाख से आठ लाख थी। इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का आदेश कायम नहीं रह सकता। इस प्रकार, हाई कोर्ट ने आक्षेपित आदेश रद्द कर दिया और पत्नी द्वारा की गई अपील स्वीकार कर ली। साथ ही अंतरिम भरण-पोषण देने वाले आदेश को रद्द कर दिया।
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